One Shot Complete Modern History नमस्कार दोस्तों आज हम आधुनिक भारत के इतिहास के पीडीएफ नोट्स को प्राप्त करेंगे तो यदि आपने इसका क्लास नहीं देखे हैं तो नीचे देख सकते हैं और आप इसका नोट भी प्राप्त कर सकते हैं नीचे पीडीएफ बटन पर जाकर आप इसे ले सकते हैं जब हम आज के भारत को देखते हैं, तो यह समझना ज़रूरी हो जाता है कि यूरोपीय ताक़तें यहाँ क्यों आईं और कैसे धीरे-धीरे उन्होंने केवल व्यापार से आगे बढ़कर राजनीति और शासन तक अपनी पकड़ बना ली।
यह कहानी तलवारों से ज़्यादा जहाज़ों, मसालों, व्यापार और चतुराई की है।
भारत का इतिहास केवल राजाओं और युद्धों का इतिहास नहीं है, बल्कि यह trade, business और power का भी इतिहास है। जब यूरोप के देशों ने भारत की wealth के बारे में सुना, तब उनका ध्यान यहाँ की ओर गया। उस समय भारत spices, cotton cloth और precious metals के लिए पूरी दुनिया में famous था। इसलिए यूरोपीय देशों को लगा कि अगर भारत से direct trade किया जाए तो बहुत मुनाफा हो सकता है।
One Shot Complete Modern History आज के time में जैसे बड़ी companies नए market ढूँढती हैं, वैसे ही उस समय यूरोपीय देशों ने India को एक profitable market के रूप में देखा।
1. यूरोपीय शक्तियाँ भारत क्यों आईं? (Why Europe Looked Towards India)
मध्यकालीन भारत को उस समय “सोने की चिड़िया” कहा जाता था।
यूरोप के देशों के लिए भारत का मतलब था –
- मसाले (काली मिर्च, दालचीनी, लौंग)
- बढ़िया कपड़ा
- सोना-चाँदी
- बड़ा और सुरक्षित बाज़ार
आज के उदाहरण से समझें:
जैसे आज बड़ी कंपनियाँ (Amazon, Google) नए बाज़ार ढूँढती हैं, वैसे ही यूरोपीय देश भारत को एक “लाभदायक मार्केट” मानते थे।
2. व्यापारी पहले आए या कंपनियाँ?
यह बहुत ज़रूरी पॉइंट है, क्योंकि परीक्षाओं में यहीं सबसे ज़्यादा गलती होती है।
साफ़ नियम याद रखें
- पहले व्यापारी आए
- बाद में कंपनियाँ बनीं
आने का सही क्रम
- पुर्तगाली – 1498
- डच – 1596
- अंग्रेज – 1600 के आसपास
- डेनिश – 1616
- फ्रांसीसी – 1664
ट्रिक:
डच व्यापारी पहले आए, लेकिन अंग्रेजों की कंपनी पहले बनी
3. पुर्तगाली – भारत पहुँचने वाले पहले यूरोपीय
वास्को-डि-गामा और समुद्री रास्ता
- 1498 में वास्को-डि-गामा समुद्री रास्ते से कालीकट पहुँचा
- यही भारत और यूरोप को जोड़ने वाला पहला समुद्री मार्ग था
आसान उदाहरण:
जैसे किसी गाँव तक पहली बार पक्की सड़क बन जाए – फिर सब उसी रास्ते से आने लगते हैं।
पुर्तगालियों की खास नीतियाँ
(1) ब्लू वाटर नीति
- समुद्र पर पूरा नियंत्रण
- जो जहाज़ बिना अनुमति चले, उसे रोकना
(2) कार्टाज़ व्यवस्था
- व्यापार करने के लिए पुर्तगालियों से लाइसेंस लेना ज़रूरी
- बिना परमिट = कोई व्यापार नहीं
प्रमुख पुर्तगाली शासक
फ्रांसिस्को डी अल्मीडा (1505-09)
- नौसेना को सबसे मज़बूत बनाया
अल्फोंसो डी अल्बुकर्क (1509-15)
- 1510 में गोवा पर कब्ज़ा
- भारतीय महिलाओं से विवाह को बढ़ावा
- सती प्रथा का विरोध
उद्देश्य: भारत में स्थायी जड़ें जमाना
पुर्तगालियों का पतन
- समय के साथ शक्ति कम होती गई
- 1739 में मराठों ने बसीन और साल्सेट छीन लिया
4. अंग्रेज – धैर्य और कूटनीति के साथ
अंग्रेज तलवार से नहीं, बातचीत और समझौते से आगे बढ़े।
अंग्रेजी कंपनी की शुरुआत
- 1600 – महारानी एलिज़ाबेथ प्रथम ने चार्टर दिया
- कंपनी का नाम: ईस्ट इंडिया कंपनी
मुगल दरबार से दोस्ती
विलियम हॉकिन्स (1609)
- जहाँगीर के दरबार में पहुँचे
- तुर्की भाषा जानते थे, इसलिए प्रभाव पड़ा
थॉमस रो (1615)
- स्थायी व्यापारिक अधिकार मिले
आज के उदाहरण से:
जैसे कोई विदेशी कंपनी सरकार से लाइसेंस लेकर काम करे।
अंग्रेजों की पहली फैक्ट्री
- 1613 – सूरत (पहली स्थायी फैक्ट्री)
- बाद में मद्रास, बम्बई, कलकत्ता बने बड़े केंद्र
5. डच – व्यापार में माहिर लेकिन राजनीति में कमजोर
डच ईस्ट इंडिया कंपनी (VOC)
- 1602 में स्थापना
- पहला केंद्र: मसुलीपट्टनम (1605)
- मुख्यालय: पुलिकट
डचों की खास बात
- वेतन पर काम करने वाले कर्मचारी
- व्यापारिक अनुशासन
पतन
- 1759 – बेदरा का युद्ध
- अंग्रेजों से हार
- ध्यान इंडोनेशिया पर केंद्रित किया
6. डेनिश और स्वीडिश
डेनिश (डेनमार्क)
- 1620 – ट्रांकेबार (तमिलनाडु)
- सेरामपुर (बंगाल)
स्वीडिश
- कंपनी: 1731
- व्यापार ज़्यादातर चीन तक सीमित
भारत में राजनीतिक प्रभाव नहीं बना पाए
7. फ्रांसीसी – अंग्रेजों के सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी
फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी
- 1664 में स्थापना
- पूरी तरह सरकारी नियंत्रण
प्रमुख केंद्र
- सूरत (1668)
- पांडिचेरी (1674) – फ्रांसीसी संस्कृति का केंद्र
बाद में कर्नाटक युद्धों में अंग्रेजों से संघर्ष
8. त्वरित तुलना (एक नज़र में याद करें)
| यूरोपीय शक्ति | आगमन | पहली फैक्ट्री | मुख्य केंद्र | खास पहचान |
|---|---|---|---|---|
| पुर्तगाली | 1498 | कोचीन (1503) | गोवा | समुद्री शक्ति |
| अंग्रेज | 1600 | सूरत (1613) | बम्बई/मद्रास | कूटनीति |
| डच | 1596 | मसुलीपट्टनम | पुलिकट | व्यापार |
| डेनिश | 1616 | ट्रांकेबार | सेरामपुर | सीमित |
| फ्रांसीसी | 1664 | सूरत | पांडिचेरी | सरकारी नियंत्रण |
9. निष्कर्ष One Shot Complete Modern History
यूरोपीय कंपनियाँ भारत में केवल व्यापार के लिए आई थीं, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने
- व्यापार
- राजनीति
- और शासन
तीनों पर नियंत्रण की कोशिश की।
सबसे बड़ा सबक:
जो शक्ति व्यापार, कूटनीति और सेना – तीनों में संतुलन बनाती है, वही टिकती है। इसी संतुलन के कारण अंग्रेज भारत में सबसे लंबे समय तक टिक पाए।
अंग्रेजों का भारत में विस्तार: One Shot Complete Modern History
जब अंग्रेज भारत आए थे, तब उनका इरादा यहाँ राज करने का नहीं था। वे तो बस business करने आए थे। उनका main goal था मसाले, कपड़ा और दूसरी valuable चीज़ें खरीदकर Europe में बेचना। लेकिन समय के साथ परिस्थितियाँ बदलीं और वही व्यापारी धीरे-धीरे शासक (ruler) बन गए।
अब सवाल यह है –
एक कंपनी पूरे देश पर कैसे राज करने लगी?
इसी सवाल का जवाब है यह पूरी कहानी।
अंग्रेजों ने भारत को मौका क्यों समझा?
18वीं शताब्दी में भारत की हालत ऐसी थी कि
- मुगल साम्राज्य कमजोर हो चुका था
- छोटे-छोटे राजा आपस में लड़ रहे थे
- कोई central strong power नहीं थी
आज के example से समझें:
अगर किसी इलाके में strong police या government न हो, तो बाहर वाला फायदा उठा लेता है।
अंग्रेजों ने भी यही किया।
यूरोपीय ताकतों की आपसी लड़ाई
भारत में सिर्फ अंग्रेज ही नहीं थे।
यहाँ पहले से मौजूद थे –
- फ्रांसीसी
- डच
- पुर्तगाली
सबका मकसद एक ही था – profit + power।
इन सबकी लड़ाई का सबसे बड़ा मैदान बना दक्षिण भारत, जहाँ कर्नाटक युद्ध हुए।
कर्नाटक युद्ध क्यों हुए?
कर्नाटक युद्ध असल में
England vs France की लड़ाई थी,
लेकिन लड़ी गई भारत की ज़मीन पर।
यह तीन युद्ध थे, जो लगभग 20 साल तक चले।
कर्नाटक युद्धों को आसान भाषा में समझें
पहला कर्नाटक युद्ध (1746–48)
- European war का असर भारत तक आया
- लड़ाई के बाद अंग्रेजों को मद्रास वापस मिला
दूसरा कर्नाटक युद्ध (1749–54)
- अंग्रेजों ने local राजाओं की राजनीति में दखल दिया
- अपने पसंद के ruler को गद्दी पर बैठाया
तीसरा कर्नाटक युद्ध (1756–63)
- सबसे important war
- 1760 में वांडीवाश की लड़ाई
- अंग्रेजों ने फ्रांसीसियों को पूरी तरह हरा दिया
यहीं से फ्रांसीसी लगभग बाहर हो गए।
Question for you:
अगर फ्रांसीसी जीत जाते, तो क्या आज भारत का इतिहास अलग होता?
अपनी राय comment में लिखिए
बंगाल क्यों बना अंग्रेजों का main target?
कर्नाटक में जीत के बाद अंग्रेजों की नजर पड़ी बंगाल पर।
क्यों?
क्योंकि बंगाल उस समय
- सबसे अमीर प्रांत था
- खेती, व्यापार और revenue बहुत ज्यादा था
Simple example:
जिसके पास पैसा, उसके पास power।
प्लासी की लड़ाई (1757) – युद्ध कम, धोखा ज्यादा
बंगाल के नवाब थे सिराज-उद-दौला।
उन्हें अंग्रेजों की बढ़ती ताकत पसंद नहीं थी।
लेकिन अंग्रेजों ने
- मीर जाफर जैसे लोगों को लालच दिया
- अंदर से गद्दारी करवाई
प्लासी की लड़ाई में
- सेना बड़ी नवाब की थी
- जीत अंग्रेजों की हुई
क्योंकि अपने ही लोग साथ छोड़ गए।
बक्सर की लड़ाई (1764) – असली turning point
प्लासी धोखे से जीती गई,
लेकिन बक्सर अंग्रेजों की real military power दिखाता है।
इस लड़ाई में अंग्रेजों ने
- बंगाल
- अवध
- मुगल बादशाह
तीनों को हरा दिया।
इसके बाद 1765 में इलाहाबाद की संधि हुई।
इलाहाबाद की संधि से क्या बदला?
इस संधि में अंग्रेजों को
- बंगाल, बिहार, उड़ीसा की tax वसूली (Diwani rights) मिल गई
मतलब:
राजा नाम का, पैसा कंपनी का।
आज के example से समझें:
Company सब कमाए, लेकिन जिम्मेदारी किसी और की।
यहीं से अंग्रेज असली शासक बनने लगे।
दक्षिण भारत में सबसे बड़ा विरोध – मैसूर
मैसूर में
- हैदर अली
- और उनके बेटे टीपू सुल्तान
अंग्रेजों के सबसे बड़े दुश्मन बने।
टीपू सुल्तान modern सोच वाले राजा थे।
उन्होंने
- नई technology अपनाई
- फ्रांसीसियों से दोस्ती की
- अंग्रेजों को खुली चुनौती दी
आंग्ल-मैसूर युद्ध आसान शब्दों में
कुल चार युद्ध हुए।
- पहले दो युद्धों में अंग्रेजों को ज्यादा सफलता नहीं मिली
- तीसरे युद्ध में टीपू को नुकसान हुआ
- चौथे युद्ध (1799) में टीपू सुल्तान शहीद हो गए
इसके बाद मैसूर भी अंग्रेजों के हाथ में चला गया।
आप क्या सोचते हैं?
अगर टीपू सुल्तान जीत जाते, तो क्या अंग्रेज भारत में टिक पाते?
Comment में बताइए
उत्तर भारत की आखिरी ताकत – सिख साम्राज्य
पंजाब में महाराजा रणजीत सिंह बहुत शक्तिशाली शासक थे।
उनके रहते अंग्रेज वहाँ कुछ नहीं कर पाए।
1809 की अमृतसर संधि से
- सतलुज नदी सीमा बनी
- दोनों में शांति रही
लेकिन रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद
- आपसी लड़ाइयाँ शुरू हुईं
- अंग्रेजों को मौका मिल गया
आंग्ल-सिख युद्ध और पंजाब का विलय
दो बड़े युद्ध हुए।
आखिरकार 1849 में
पंजाब को ब्रिटिश भारत में मिला लिया गया।
इसके बाद अंग्रेजों के सामने कोई बड़ी रुकावट नहीं बची।
बिना युद्ध के राज – सहायक संधि
हर बार लड़ाई जरूरी नहीं थी।
लॉर्ड वेलेजली ने Subsidiary Alliance शुरू की।
इसमें
- राजा की सुरक्षा अंग्रेज करेंगे
- बदले में राजा आज़ाद नहीं रहेगा
हैदराबाद, अवध, पेशवा जैसे राज्य
इसी तरह अंग्रेजों के अधीन आए।
यह तरीका आज की politics जैसा था –
सीधे कब्जा नहीं, control अंदर से।
निष्कर्ष: अंग्रेज कैसे पूरे भारत के मालिक बने?
अंग्रेजों की सफलता का reason सिर्फ लड़ाई नहीं था।
उन्होंने
- पैसा (Bengal revenue)
- चालाकी (diplomacy)
- मौका देखकर हमला
सबका सही इस्तेमाल किया।
एक company जो trade करने आई थी,
वही company पूरे देश पर राज करने लगी।
Final Question:
क्या अंग्रेजों की जीत उनकी ताकत थी या भारतीय राजाओं की कमजोरी?
आपकी क्या राय है – comment में ज़रूर लिखिए

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